रायपुर। तेजी से बदलते दौर में तकनीक जहां जीवन को आसान बना रही है, वहीं इसके दुष्परिणाम भी उतनी ही तेजी से सामने आ रहे हैं, खासकर बच्चों के जीवन में। मोबाइल फोन अब केवल संपर्क या जानकारी का साधन नहीं रह गया है, बल्कि बच्चों की दिनचर्या, सोच और व्यवहार को नियंत्रित करने वाला प्रमुख माध्यम बनता जा रहा है। इसी संदर्भ में डॉक्टर शानू मसीह ने बच्चों में बढ़ते मोबाइल उपयोग को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि आज की पीढ़ी मोबाइल पर इतनी अधिक सक्रिय हो गई है कि उसका सीधा असर बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और सामाजिक व्यवहार पर दिखाई देने लगा है। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार यह समस्या केवल किसी एक परिवार या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर घर में किसी न किसी रूप में मौजूद है। मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों को वास्तविक दुनिया से काटकर एक आभासी दुनिया में धकेल रहा है, जहां भावनात्मक जुड़ाव, शारीरिक सक्रियता और सामाजिक संवाद धीरे-धीरे कमजोर होते जा रहे हैं। यह स्थिति आने वाले समय में समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
बच्चों की आंखों पर मोबाइल स्क्रीन के प्रभाव को लेकर डॉक्टर शानू मसीह ने विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि लगातार स्क्रीन देखने की आदत ने कम उम्र में ही आंखों से जुड़ी समस्याओं को जन्म देना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक मोबाइल पर वीडियो देखने, गेम खेलने या सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से बच्चों में आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है। इसके साथ ही सिरदर्द, आंखों में जलन, आंखों का सूखापन और ड्राई आई सिंड्रोम जैसी परेशानियां तेजी से बढ़ रही हैं। डॉक्टर शानू मसीह का कहना है कि पहले ये समस्याएं अधिकतर वयस्कों में देखने को मिलती थीं, लेकिन अब बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। आंखों पर लगातार पड़ने वाला दबाव बच्चों की पढ़ने-लिखने की क्षमता को प्रभावित करता है और उनकी एकाग्रता में भी कमी लाता है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या भविष्य में स्थायी दृष्टि दोष का कारण बन सकती है, जिसे ठीक करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
मोबाइल के बढ़ते उपयोग का असर बच्चों की नींद पर भी साफ तौर पर देखा जा रहा है, जिसे लेकर डॉक्टर शानू मसीह ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि देर रात तक मोबाइल चलाने की आदत बच्चों के प्राकृतिक नींद चक्र को बिगाड़ रही है। मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी दिमाग को सक्रिय बनाए रखती है, जिससे बच्चों को समय पर नींद नहीं आती। नींद की कमी के कारण बच्चों में थकान, चिड़चिड़ापन और अनिद्रा जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार पर्याप्त नींद न मिलने से बच्चों के हार्माेनल संतुलन पर भी नकारात्मक असर पड़ता है, जिसका सीधा प्रभाव उनकी याददाश्त, एकाग्रता और सीखने की क्षमता पर पड़ता है। पढ़ाई में पिछड़ना, जल्दी ऊब जाना और ध्यान केंद्रित न कर पाना इसी का परिणाम है। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो बच्चों के संपूर्ण विकास पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
शारीरिक स्वास्थ्य के संदर्भ में मोबाइल उपयोग के दुष्परिणामों पर बात करते हुए डॉक्टर शानू मसीह ने कहा कि बच्चों की शारीरिक गतिविधियां लगातार कम होती जा रही हैं। पहले जहां बच्चे खेल के मैदानों में समय बिताते थे, अब वही समय मोबाइल स्क्रीन के सामने गुजर रहा है। इस बदलाव के कारण बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही गर्दन, कंधों और रीढ़ की हड्डी में दर्द की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। लंबे समय तक झुकी हुई गर्दन के साथ मोबाइल देखने से पोस्चर बिगड़ रहा है, जिसका असर शरीर की संरचना पर पड़ रहा है। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार यह समस्या धीरे-धीरे गंभीर हड्डी और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियों का रूप ले सकती है। शारीरिक सक्रियता की कमी बच्चों की ऊर्जा, सहनशक्ति और आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है, जिससे उनका समग्र विकास बाधित होता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर डॉक्टर शानू मसीह ने बताया कि मोबाइल की लत बच्चों को भावनात्मक रूप से असंतुलित बना रही है। मोबाइल से दूर होने पर बच्चों में बेचौनी, गुस्सा और असहजता बढ़ जाती है। वे छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ने लगते हैं और तनाव महसूस करते हैं। धीरे-धीरे यह तनाव अवसाद का रूप भी ले सकता है। डॉक्टर शानू मसीह का कहना है कि मोबाइल बच्चों के दिमाग को त्वरित उत्तेजना का आदी बना देता है, जिससे वास्तविक जीवन की गतिविधियां उन्हें नीरस लगने लगती हैं। यह मानसिक स्थिति बच्चों को सामाजिक दूरी की ओर ले जाती है, जहां वे दोस्तों और परिवार से कटने लगते हैं और अकेलेपन का अनुभव करते हैं।

समाज में बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों पर चर्चा करते हुए डॉक्टर शानू मसीह ने यह भी बताया कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों की सामाजिक समझ को कमजोर कर रहा है। बच्चे अब आमने-सामने बातचीत करने के बजाय स्क्रीन के जरिए संवाद करने के आदी हो रहे हैं। इसका असर उनके बोलने के ढंग, भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता और दूसरों को समझने की संवेदनशीलता पर पड़ रहा है। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार जब बच्चे लंबे समय तक मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो वे परिवार के साथ समय बिताने से कतराने लगते हैं। पारिवारिक बातचीत कम होने से बच्चों के मन में अपनी बात कहने का आत्मविश्वास घटता है और वे धीरे-धीरे भीतर ही भीतर अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं। यह स्थिति भविष्य में रिश्तों को निभाने में कठिनाई का कारण बन सकती है। सामाजिक मेल-जोल की कमी बच्चों को एक सीमित दुनिया में कैद कर देती है, जहां वे वास्तविक अनुभवों से वंचित रह जाते हैं।
बच्चों की पढ़ाई पर मोबाइल के प्रभाव को लेकर भी डॉक्टर शानू मसीह ने गंभीर संकेत दिए हैं। उन्होंने बताया कि मोबाइल पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने से बच्चों की एकाग्रता कमजोर हो रही है। पढ़ाई के दौरान उनका ध्यान बार-बार भटकता है और वे लंबे समय तक किसी विषय पर फोकस नहीं कर पाते। मोबाइल की तेज रफ्तार दुनिया बच्चों को तुरंत मनोरंजन की आदत डाल देती है, जिससे किताबें और पढ़ाई उन्हें बोझ लगने लगती हैं। डॉक्टर शानू मसीह का कहना है कि इसका सीधा असर बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर पड़ता है। परीक्षा के समय याददाश्त कमजोर होना, विषयों को ठीक से समझ न पाना और सीखने में रुचि कम होना इसी का परिणाम है। यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह बच्चों के भविष्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
डॉक्टर शानू मसीह ने इस समस्या को केवल बच्चों तक सीमित न मानते हुए अभिभावकों की भूमिका पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि कई बार अनजाने में माता-पिता ही बच्चों को मोबाइल की ओर अधिक आकर्षित कर देते हैं। व्यस्त दिनचर्या के कारण बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल थमा देना एक आसान समाधान लगता है, लेकिन यही आदत आगे चलकर समस्या बन जाती है। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग पर स्पष्ट समय सीमा तय करें और खुद भी मोबाइल के सीमित इस्तेमाल का उदाहरण प्रस्तुत करें। जब बच्चे अपने माता-पिता को संतुलित जीवन जीते देखते हैं, तो वे भी उसी दिशा में आगे बढ़ते हैं।
खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉक्टर शानू मसीह ने कहा कि बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए शारीरिक और मानसिक सक्रियता बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि खेल बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से मजबूत बनाते हैं, बल्कि उनमें टीमवर्क, अनुशासन और आत्मविश्वास भी विकसित करते हैं। इसके अलावा चित्रकला, संगीत, लेखन और अन्य रचनात्मक गतिविधियां बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता को बढ़ाती हैं। डॉक्टर शानू मसीह का मानना है कि जब बच्चों को मोबाइल से हटाकर ऐसी गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जाता है, तो उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है। वे अधिक खुश, संतुलित और आत्मनिर्भर बनते हैं, जिससे उनका समग्र विकास संभव हो पाता है।
परिवार के भीतर संवाद को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी डॉक्टर शानू मसीह ने विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों के साथ नियमित बातचीत करना, उनकी समस्याओं को सुनना और उनके विचारों को महत्व देना बेहद जरूरी है। जब बच्चे अपने माता-पिता के साथ खुलकर बात करते हैं, तो वे मानसिक रूप से अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार परिवार के साथ समय बिताने से बच्चों में भावनात्मक स्थिरता आती है और वे बाहरी प्रभावों से कम प्रभावित होते हैं। यह संवाद बच्चों को मोबाइल की आभासी दुनिया से बाहर निकालकर वास्तविक रिश्तों से जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है। अंत में डॉक्टर शानू मसीह ने समाज के सभी वर्गों से अपील करते हुए कहा कि बच्चों में बढ़ते मोबाइल उपयोग को गंभीरता से लेने की जरूरत है। यह केवल एक तकनीकी या समय प्रबंधन की समस्या नहीं है, बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ा विषय है। यदि समय रहते सही कदम उठाए जाएं, तो इस चुनौती का समाधान संभव है। उन्होंने अभिभावकों, शिक्षकों और समाज से मिलकर प्रयास करने का आग्रह किया, ताकि बच्चों को संतुलित, स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण मिल सके। डॉक्टर शानू मसीह के अनुसार सही मार्गदर्शन, सीमित मोबाइल उपयोग और सकारात्मक जीवनशैली के माध्यम से बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सकता है, जो आने वाले समय में एक मजबूत और जागरूक समाज की नींव रखेगा।





