रामनगर(सुनील कोठारी)। 2026 का बजट पेश होते ही देश की आर्थिक दिशा और सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर बहस तेज हो गई। बजट भाषण में जिस तरह आम किसान, मजदूर, मध्यम वर्ग और गरीब तबके का नाम तक नहीं लिया गया, उसने स्पष्ट संकेत दे दिया कि अब सरकार की नजर आर्थिक नीति में सीधे जनता की भलाई से हटकर, बड़े उद्योगपतियों, कॉर्पोरेट्स और वित्तीय बाजार की ओर केंद्रित हो गई है। पिछले कई वर्षों में सरकार ने यह दिखाया कि आर्थिक निर्णयों में आम नागरिक की भागीदारी सीमित है, लेकिन इस बार का बजट इस प्रक्रिया को और स्पष्ट कर गया। लगभग 17 करोड़ डीमेट अकाउंट रखने वाले निवेशक अब देश की आर्थिक गतिविधियों के मुख्य पात्र बने हुए हैं, और शेयर बाजार अब भारत की अर्थव्यवस्था का वास्तविक बैरोमीटर बन चुका है। सरकार ने साफ संकेत दिया है कि अब वित्तीय जिम्मेदारी बड़े प्लेयर्स और कॉरपोरेट घरानों के हाथ में होगी, और आम आदमी का योगदान केवल सीमित रूप में रहेगा।
बजट में सरकार ने यह स्वीकार किया कि अपनी सीमित वित्तीय साधनों और जिओपॉलिटिकल दबावों के कारण अब उसे सीधे अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करना कठिन हो गया है। बैंकिंग सुधारों और फाइनेंशियल रेगुलेशन के माध्यम से बड़े निवेशकों और उद्योगपतियों के लिए अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। फॉरेक्स और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए विशेष कमेटियां बनाई जाएंगी, जो यह सुनिश्चित करेंगी कि कॉरपोरेट्स अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने हित सुरक्षित रख सकें। इस बजट में आम नागरिक कहीं पीछे रह गया है। सरकार ने यह संकेत स्पष्ट किया है कि रिटेल निवेशक अब सट्टेबाजी या जोखिम भरे निवेश के माध्यम से बड़ा लाभ नहीं कमा पाएंगे, बल्कि बड़े प्लेयर्स के लिए बाजार सुरक्षित रहेगा।
शेयर बाजार और निवेशकों के लिए यह बजट विशेष महत्व रखता है। स्टॉक्स ट्रेडिंग टैक्स (एसटीटी) को 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत कर दिया गया, जिससे निवेशकों को तात्कालिक झटका लगा। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है: छोटे निवेशकों को नियंत्रित करना और बड़े निवेशकों के लिए बाजार को सुरक्षित बनाना। पिछले वर्षों में पीएसयू और सरकारी बॉन्ड्स से जुड़े निवेशकों ने पहले ही लाभ कमा लिया है, अब सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बाजार में केवल गंभीर और बड़े निवेशक ही सक्रिय रहें। इसके माध्यम से यह संदेश भी जाता है कि सरकार के पास सीमित वित्तीय साधन हैं और उसे प्राथमिकता के रूप में बड़े कॉरपोरेट्स को देखना आवश्यक हो गया है।

पिछले बजट और इस बार के बजट में तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि सरकार ने कई क्षेत्रों में वास्तविक खर्च और अनुमानित बजट के बीच अंतर को ध्यान में रखते हुए नया बजट तैयार किया है। उदाहरण के लिए, कृषि क्षेत्र के लिए पिछले वर्ष 15838 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया था, जिसमें केवल 151853 करोड़ खर्च हो पाए। इस बार का बजट 162671 करोड़ रुपये का है। शिक्षा क्षेत्र में बजट 12,28,650 करोड़ से बढ़ाकर इस बार 13,90,000 करोड़ कर दिया गया है। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए पिछले वर्ष 98031 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, जिसमें केवल 94625 करोड़ खर्च हुए। समाज कल्याण और ग्रामीण विकास क्षेत्रों में भी इसी प्रकार का अंतर देखा गया। यह संकेत देता है कि बजट केवल एक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि आर्थिक और पॉलिटिकल संदेश देने का माध्यम बन गया है।
बजट में उद्योगों और कॉरपोरेट्स के लिए विशेष अवसर दिए गए हैं। एसएमई और एमएसएमई के लिए 7 लाख करोड़ रुपये की फंडिंग की व्यवस्था की गई है। इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट निर्माण के लिए 4000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि कार्बन कैप्चर तकनीक में 20,000 करोड़ रुपये का निवेश तय किया गया है। शहरों के बुनियादी ढांचे के लिए 12.2 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इस बजट से यह स्पष्ट होता है कि सरकार ने बड़े उद्योगपतियों और सर्विस सेक्टर को वैश्विक बाजार में मजबूत स्थिति बनाए रखने के लिए प्राथमिकता दी है। कॉर्पोरेट टैक्स और बायबैक पॉलिसी में भी बदलाव हुए हैं। बायबैक मामलों में प्रमोटर्स को अब 20 प्रतिशत टैक्स देना होगा, जबकि पिछले वर्ष यह 30 प्रतिशत था। इसका उद्देश्य है कि बड़े निवेशक बाजार में अधिक व्यवस्थित रूप से निवेश करें और छोटे निवेशक सट्टेबाजी से दूर रहें। इस बदलाव के माध्यम से सरकार यह संदेश दे रही है कि अब बाजार केवल बड़े प्लेयर्स के लिए सुरक्षित रहेगा और रिटेल निवेशकों को सीधे लाभ कमाने की संभावना कम होगी। इसके साथ ही सरकार आर्थिक अपराधियों और मुनाफाखोरों के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में बजट के प्रावधान पर्याप्त हैं, लेकिन अधिकांश लाभ प्राइवेट सेक्टर को मिलेगा। उदाहरण के लिए, यदि सरकार 1 लाख करोड़ रुपये स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च कर रही है, तो प्राइवेट स्वास्थ्य क्षेत्र लगभग छह गुना मुनाफा कमाता है। शिक्षा क्षेत्र में 15 लाख करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले प्राइवेट शिक्षा संस्थाओं को 6-7 लाख करोड़ का लाभ होता है। यह बजट स्पष्ट करता है कि सरकार अब सार्वजनिक क्षेत्र के बजाय प्राइवेट सेक्टर को प्राथमिकता दे रही है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) के संदर्भ में भी कई कदम उठाए गए हैं। भारत अब विभिन्न देशों के साथ व्यापारिक समझौतों के माध्यम से सस्ते माल की आयात क्षमता बढ़ाना चाहता है। चीन, यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और रूस से जुड़े व्यापारिक मार्गों को मजबूत किया जा रहा है। तेल क्षेत्र में स्थिति चुनौतीपूर्ण रही, जहां रिलायंस को रूस और ईरान से तेल आयात में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अमेरिकी और अन्य अंतरराष्ट्रीय नीतियों के प्रभाव के कारण भारत की बड़ी कंपनियों को भरोसा नहीं था कि सरकार आवश्यक समर्थन देगी। इस बजट के माध्यम से सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि बड़ी कंपनियों के लिए आर्थिक और वित्तीय समर्थन सुनिश्चित किया जाएगा।

आईटी और टेलीकॉम क्षेत्र के लिए इस बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं। पिछले वर्ष इस क्षेत्र के लिए 86,000 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, लेकिन केवल 53,000 करोड़ खर्च किए गए। इस बार 74,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। सरकार का उद्देश्य प्राइवेट सेक्टर के माध्यम से निवेश बढ़ाना है। डेटा सेंटर और क्लाउड सर्विसेज के लिए विदेशी कंपनियों को टैक्स हॉलीडे देने का प्रावधान किया गया है। इससे आईटी और टेलीकॉम क्षेत्र में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा मजबूत होगी और विदेशी निवेश आकर्षित होगा। टेक्सटाइल और फाइबर सेक्टर में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। राष्ट्रीय फाइबर योजना और मेगा टेक्सटाइल पार्क के माध्यम से मैनमेड फाइबर और हेंडीक्राफ्ट को बढ़ावा मिलेगा। महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना के तहत खादी और स्थानीय उत्पादकों के उत्पादन, प्रशिक्षण और विपणन को बढ़ावा मिलेगा। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार स्थानीय कारीगर और स्वदेशी उत्पादकों को प्रोत्साहित करना चाहती है, हालांकि प्राथमिकता बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों को दी गई है।
इस बजट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने स्पष्ट किया कि आर्थिक निर्णय अब बड़े कॉरपोरेट्स और वित्तीय प्लेयर्स के हाथ में होंगे। आम जनता, छोटे किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग के लिए बजट में कोई विशेष राहत या उल्लेख नहीं किया गया। इसके बावजूद, सरकार ने सीमित क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण विकास के लिए बजट आवंटित किया है, ताकि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप न हो। बजट के माध्यम से सरकार ने यह स्पष्ट किया कि अब देश की आर्थिक दिशा बड़े उद्योगपतियों, निवेशकों और कॉरपोरेट घरानों के हाथ में है। शेयर बाजार और वित्तीय बाजार अब देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य बैरोमीटर हैं। एसटीटी और बायबैक नीतियों के माध्यम से रिटेल निवेशकों को नियंत्रित किया जाएगा और बड़े प्लेयर्स को अधिक अधिकार और लाभ मिलेगा। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है कि देश की आर्थिक गतिविधियों का भार अब सार्वजनिक क्षेत्र के बजाय निजी क्षेत्र और कॉर्पोरेट घरानों के जिम्मे रहेगा।





