भारत(सुनील कोठारी)। देश की आर्थिक दिशा को मजबूती देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार पिछले कुछ वर्षों से पूंजीगत व्यय को विकास का प्रमुख इंजन बताती रही है। राजमार्गों के विस्तार, नए बंदरगाहों के निर्माण, रेलवे नेटवर्क के आधुनिकीकरण और हवाई अड्डों के विकास को लेकर बड़े दावे किए गए, लेकिन ताज़ा बजट आंकड़े इन दावों की ज़मीनी हकीकत पर सवाल खड़े करते हैं। रविवार 1 फरवरी को संसद में पेश किए गए नवीनतम आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि जिस स्तर की पूंजीगत व्यय वृद्धि का अनुमान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते वर्षों में लगाया था, वह वास्तविकता में साकार नहीं हो पा रहा है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों के वास्तविक और संशोधित अनुमान लगातार उस वर्ष के बजट अनुमानों से कम रहे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि योजना और क्रियान्वयन के बीच एक स्पष्ट अंतर बना हुआ है।
आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार के कुल खर्च में अनुमानित कमी एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की है। बजट अनुमान के तहत जहां कुल खर्च 50.65 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था, वहीं संशोधित आंकड़े इसे घटाकर 49.65 लाख करोड़ रुपये के आसपास दिखाते हैं। पहली नज़र में यह गिरावट केवल दो प्रतिशत के करीब प्रतीत होती है, लेकिन जब इसके भीतर छिपे घटकों का विश्लेषण किया जाता है, तो तस्वीर कहीं अधिक गंभीर नजर आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कुल बजटीय खर्च में आई इस कमी का बड़ा हिस्सा पूंजीगत व्यय में कटौती से जुड़ा है, जो सरकार के विकासोन्मुखी दावों के विपरीत संकेत देता है।
गहराई से देखने पर यह सामने आता है कि चालू वित्त वर्ष में कुल खर्च में जो कमी आई है, उसका लगभग एक-चौथाई हिस्सा केवल पूंजीगत व्यय घटने के कारण है। यह वही पूंजीगत व्यय है, जिसे सरकार आर्थिक पुनरुद्धार और रोजगार सृजन का आधार मानती रही है। कोविड-19 महामारी के बाद से केंद्र सरकार ने निजी निवेश की सुस्ती को देखते हुए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाने का रास्ता चुना था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश से न केवल मांग बढ़ेगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। हालांकि, हालिया आंकड़े इस रणनीति की निरंतरता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
महामारी के बाद के दौर में जब निजी क्षेत्र जोखिम लेने से हिचक रहा था, तब सरकार ने पूंजीगत व्यय को आर्थिक सहारे के रूप में प्रस्तुत किया। राजमार्ग, बंदरगाह, हवाई अड्डे और रेलवे लाइनें बिछाने जैसी परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई। इन प्रयासों को विकास की रीढ़ बताते हुए सरकार ने हर बजट में रिकॉर्ड आवंटन की घोषणा की। इसके बावजूद वास्तविक खर्च में लगातार गिरावट यह दर्शाती है कि या तो परियोजनाओं के क्रियान्वयन में बाधाएँ आ रही हैं, या फिर प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर अपेक्षित तैयारी नहीं हो पा रही है। दोनों ही स्थितियाँ अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय हैं।
बुनियादी ढांचा क्षेत्र को लेकर सरकार की मंशा को रेखांकित करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को संसद में कहा कि आर्थिक विकास को गति देने और उसे बनाए रखने के लिए सरकार छह प्रमुख क्षेत्रों में हस्तक्षेप का प्रस्ताव रखती है। इनमें विनिर्माण को बढ़ावा देना, पुराने औद्योगिक क्षेत्रों का कायाकल्प, चौंपियन एमएसएमई का निर्माण, बुनियादी ढांचे को नई रफ्तार देना, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करना तथा शहरी आर्थिक क्षेत्रों का विकास शामिल है। उनके इस वक्तव्य से यह संकेत मिलता है कि सरकार बुनियादी ढांचे को विकास की कुंजी मानती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ज़मीनी स्तर पर यह ‘शक्तिशाली धक्का’ अपेक्षित रूप में नहीं दिख रहा।
वित्त मंत्री द्वारा जारी संशोधित अनुमानों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में पूंजीगत व्यय घटकर लगभग 10.95 लाख करोड़ रुपये पर सिमट जाएगा, जबकि बजट अनुमान में इसे 11.21 लाख करोड़ रुपये से अधिक रखा गया था। यह अंतर केवल संख्याओं का नहीं है, बल्कि इससे नीति की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 10.95 लाख करोड़ रुपये के इस आंकड़े में फरवरी और मार्च 2026 के लिए अनुमानित खर्च भी शामिल है। इसका अर्थ यह हुआ कि वास्तविक पूंजीगत व्यय का सटीक आंकड़ा अगले वर्ष के बजट में ही सामने आएगा, और उसमें और गिरावट की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
यदि इस कटौती को प्रतिशत के रूप में देखा जाए, तो यह लगभग 2.26 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाती है, लेकिन वास्तविक राशि के संदर्भ में यह 25,335 करोड़ रुपये से अधिक की कमी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी रकम का कम खर्च होना कई परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकता है। बुनियादी ढांचा परियोजनाएँ न केवल निर्माण क्षेत्र को गति देती हैं, बल्कि उनसे जुड़े अनेक सहायक उद्योगों और सेवाओं पर भी असर डालती हैं। ऐसे में पूंजीगत व्यय में लगातार हो रही कमी रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

यह स्थिति कोई नई नहीं है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो स्पष्ट होता है कि पूंजीगत व्यय लगातार बजट अनुमानों से पीछे रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 में केंद्र सरकार ने पहली बार 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक का पूंजीगत व्यय आवंटित किया था। यह घोषणा 2024 के आम चुनाव के बाद पेश किए गए नियमित बजट में की गई थी और इसे सरकार की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया। हालांकि, वास्तविक खर्च केवल 9.49 लाख करोड़ रुपये के आसपास ही सीमित रहा, जो बजट अनुमान से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक कम था।
इसी तरह, वित्त वर्ष 2024-25 में पूंजीगत व्यय के लिए रिकॉर्ड 11.11 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया गया था। उस समय इसे बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में ऐतिहासिक निवेश बताया गया। लेकिन नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उस वित्त वर्ष में वास्तविक पूंजीगत व्यय घटकर लगभग 10.52 लाख करोड़ रुपये रह गया। यह अंतर 59,000 करोड़ रुपये से अधिक का है, जो यह दर्शाता है कि घोषित योजनाओं और वास्तविक खर्च के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है। इस प्रवृत्ति ने नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के बीच गंभीर बहस को जन्म दिया है।
चालू वित्त वर्ष के लिए भी स्थिति अलग नहीं दिखती। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पूंजीगत व्यय को 11.11 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा बढ़ाकर 11.21 लाख करोड़ रुपये करने की घोषणा की थी। यह वृद्धि प्रतीकात्मक रूप से यह दिखाने के लिए थी कि सरकार बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाने के अपने संकल्प से पीछे नहीं हट रही है। हालांकि, रविवार को पेश किए गए संशोधित अनुमानों ने यह साफ कर दिया कि वास्तविक पूंजीगत व्यय 11 लाख करोड़ रुपये से नीचे ही रहने वाला है। यह आंकड़ा सरकार के निरंतर बढ़ते आवंटन के दावों को कमजोर करता है।
इसके बावजूद सरकार ने अगले वित्त वर्ष के लिए एक बार फिर रिकॉर्ड आवंटन की घोषणा की है। अप्रैल 2026 से मार्च 2027 की अवधि के लिए पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.22 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह आंकड़ा कागज़ पर बेहद प्रभावशाली प्रतीत होता है और यह संदेश देता है कि सरकार भविष्य में बुनियादी ढांचे पर और अधिक खर्च करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन पिछले वर्षों के अनुभव को देखते हुए सवाल यह उठता है कि क्या यह आवंटन वास्तविकता में भी उतनी ही मजबूती से खर्च हो पाएगा, या फिर यह भी पिछले अनुमानों की तरह अधूरा रह जाएगा।
बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण को लेकर भी सरकार और नीति विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज़ हो गई है। वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक रूप से बैंक ऋण पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति अब धीरे-धीरे कम हो रही है और उसकी जगह वैकल्पिक वित्तपोषण साधन तथा पूंजी बाजार के नए उपकरण सामने आ रहे हैं। यह बदलाव लंबे समय के लिए बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को स्थिर वित्त उपलब्ध कराने में मददगार माना जा रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी उल्लेख किया गया है कि इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स और रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इन माध्यमों से दीर्घकालिक संस्थागत पूंजी को बुनियादी ढांचा परिसंपत्तियों में निवेश करने का अवसर मिल रहा है। सरकार का मानना है कि इन वैकल्पिक साधनों के जरिए वित्तपोषण की चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सरकारी पूंजीगत व्यय अपने निर्धारित लक्ष्यों तक नहीं पहुँचता, तब तक निजी और संस्थागत निवेश भी पूरी क्षमता से आगे नहीं आ पाएगा।
कुल मिलाकर, ताज़ा बजट आंकड़े यह संकेत देते हैं कि केंद्र सरकार की पूंजीगत व्यय रणनीति को लेकर गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है। बड़े आवंटन और आकर्षक घोषणाओं के बावजूद यदि वास्तविक खर्च लगातार कम रहता है, तो इससे आर्थिक विकास की गति प्रभावित होना स्वाभाविक है। राजमार्गों, बंदरगाहों और रेलवे जैसे क्षेत्रों में निवेश केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह रोज़गार, औद्योगिक गतिविधि और क्षेत्रीय विकास से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में आने वाले वर्षों में यह देखना अहम होगा कि सरकार अपने घोषित लक्ष्यों को वास्तविकता में किस हद तक उतार पाती है और क्या पूंजीगत व्यय वास्तव में अर्थव्यवस्था को वह मजबूती दे पाता है, जिसका दावा हर बजट भाषण में किया जाता रहा है।





