भारत(सुनील कोठारी)। भारत की विशाल अर्थव्यवस्था के रगों में दौड़ने वाले मुख्य ईंधन यानी पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों में टैक्स कटौती के माध्यम से राहत प्रदान करने की सरकारी कवायद अब एक बहुत बड़े नीतिगत विवाद और देशव्यापी जन-आक्रोश के केंद्र में आ गई है। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर उत्पाद शुल्क और वैट (VAT) में की जाने वाली मामूली और सांकेतिक कटौतियों को अक्सर सरकारी विज्ञापनों में एक ऐतिहासिक ‘दिवाली गिफ्ट’ या ‘जनकल्याणकारी राहत पैकेज’ के रूप में जोर-शोर से पेश किया जाता है, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई कुछ और ही करुण कहानी बयां कर रही है। देश के आम मध्यमवर्गीय परिवार से लेकर सड़क किनारे रेहड़ी-पटरी और ऑटो चलाने वाले साधारण नागरिकों के बीच अब यह धारणा पत्थर की लकीर की तरह प्रबल हो गई है कि इन दिखावटी कटौतियों से जनता को इससे कोई फायदा नहीं होने वाला, क्योंकि वैश्विक बाजार की जटिल शक्तियां और बेकाबू महंगाई का चक्र इस तथाकथित राहत को चंद दिनों के भीतर ही पूरी तरह निगल जाता है। तेल की कीमतों में कुछ रुपयों की कमी का शोर जितना कर्णभेदी होता है, उसकी वास्तविक तुलना में एक आम आदमी की मासिक बचत और रसोई के बजट पर पड़ने वाला बोझ रत्ती भर भी कम नहीं होता, जो शासन की मंशा पर गहरे सवाल खड़े करता है। यह पूरी प्रक्रिया अब केवल एक चतुर राजनीतिक स्टंट और सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी बनकर रह गई है, जिसमें असली लाभार्थी आम उपभोक्ता नहीं बल्कि बिचौलिए, बड़ी तेल कंपनियां और रिफाइनरियां नजर आती हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों, वरिष्ठ पत्रकारों और बाजार विश्लेषकों का एक बहुत बड़ा और अनुभवी वर्ग इस बुनियादी बात पर पूरी तरह सहमत है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें लगातार प्रति बैरल रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रही हों, तब घरेलू टैक्स में की गई दो-चार रुपयों की कटौती ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही साबित होती है। पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम करने का वास्तविक लाभ सीधे अंतिम उपभोक्ता तक इसलिए भी नहीं पहुँच पाता क्योंकि लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और सड़क परिवहन की लागत पहले ही इतनी अधिक बढ़ चुकी होती है कि माल ढुलाई करने वाले भारी वाहन और कमर्शियल ट्रांसपोर्टर अपनी माल भाड़ा दरें कम करने को कतई तैयार नहीं होते। जब तक परिवहन का यह ढांचा महंगा बना रहता है, तब तक आम आदमी के रसोई घर की बुनियादी वस्तुएं जैसे हरी सब्जियां, दालें, कुकिंग ऑयल और दूध की कीमतों में गिरावट आने का नाम ही नहीं लेतीं। इस प्रकार, सरकारी खजाने पर राजस्व हानि के रूप में करोड़ों-अरबों का बोझ डालने के बावजूद एक आम गृहणी की थाली से महंगाई का बोझ तनिक भी कम नहीं होता, जिससे पूरी योजना विफल दिखाई देती है। जनता का अब यह स्पष्ट और मुखर मानना है कि यह टैक्स कटौती केवल एक सुनियोजित छलावा है, जो केवल आंकड़ों के भ्रामक जाल में फंसाकर लोगों को यह मनोवैज्ञानिक एहसास कराने की एक कोशिश है कि सरकार उनके प्रति संवेदनशील है, जबकि हकीकत में बाजार की कमरतोड़ महंगाई जस की तस बनी हुई है।
मध्यम वर्ग और वेतनभोगी तबके की पीड़ा को यदि सूक्ष्मता से करीब से देखें तो पता चलता है कि एक औसत मोटरसाइकिल या छोटी कार चलाने वाले मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए महीने भर में तेल पर होने वाली कुल बचत मात्र 100 से 250 रुपये के बीच सिमट कर रह जाती है। इस अत्यंत मामूली और उपहासास्पद बचत के बदले उसे अपनी संतान की शिक्षा, निजी स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं पर कई गुना ज्यादा जीएसटी (GST) और अन्य अप्रत्यक्ष करों का भारी भुगतान करना पड़ रहा है। जनता को इससे कोई फायदा नहीं होने वाला क्योंकि जब तक ईंधन की बेतहाशा कीमतों को अंततः जीएसटी के दायरे में लाकर एक राष्ट्रव्यापी स्थिर और पारदर्शी टैक्स ढांचा तैयार नहीं किया जाता, तब तक टैक्स में टुकड़ों-टुकड़ों में की गई यह चुनावी कटौती केवल तात्कालिक राहत का एक झूठा भ्रम ही पैदा करेगी। जागरूक उपभोक्ता अब इस राजनीतिक गणित को बखूबी समझने लगे हैं कि चुनाव की आहट से ठीक पहले या बड़े जनांदोलनों के दबाव के बाद की जाने वाली यह कटौतियां केवल जनता का ध्यान मूल समस्याओं से भटकाने का एक सुविधाजनक जरिया मात्र हैं। तेल कंपनियों द्वारा दैनिक आधार पर कीमतों में किए जाने वाले सूक्ष्म बदलाव अक्सर महज दो हफ्तों के भीतर ही उस सरकारी कटौती के पूरे असर को शून्य कर देते हैं, जिससे एक आम नागरिक पंप पर तेल भरवाते समय खुद को ठगा हुआ और असहाय महसूस करता है।

ग्रामीण भारत और कृषि प्रधान क्षेत्रों की बात करें तो वहाँ डीजल की कीमतों का सीधा और गहरा संबंध खेती की इनपुट लागत से होता है, लेकिन वहाँ भी धरातलीय स्थिति सरकारी दावों से बिल्कुल जुदा है। सीमांत किसानों का स्पष्ट रूप से कहना है कि डीजल पर टैक्स थोड़ा कम होने के बावजूद रसायनिक खाद, उन्नत बीज और कीटनाशकों की कीमतें पिछले एक साल में इतनी अधिक बढ़ चुकी हैं कि ईंधन की इस मामूली बचत का उनके कृषि बजट में कोई सार्थक मोल नहीं रह जाता। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती का असली और बड़ा लाभ तो केवल उन कॉर्पोरेट घरानों और बड़ी तेल रिफाइनरियों को ही मिलता है जो अपने प्रॉफिट मार्जिन को पहले ही सुरक्षित कर लेते हैं, लेकिन एक गरीब किसान या शहर के दिहाड़ी मजदूर के लिए दैनिक जीवन यापन का संघर्ष तिल-तिल कर बढ़ता ही जा रहा है। परिवहन लागत में अपेक्षित कमी न आने के कारण ग्रामीण हाट-बाजारों में भी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला उतनी ही महंगी बनी हुई है जितनी कटौती से पहले थी। यह एक कड़वा और नग्न सत्य है कि नीतिगत स्तर पर जो राहत कागजों में करोड़ों की चमक-धमक वाली दिखती है, वह एक साधारण भारतीय नागरिक के फटे हुए बटुए तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती है, जिससे सरकार के ‘अंतिम छोर तक लाभ’ और ‘लोक कल्याणकारी’ होने के बड़े-बड़े दावों पर एक गंभीर संवैधानिक और नैतिक सवालिया निशान लग जाते हैं।
व्यापारिक जगत और लॉजिस्टिक्स सेक्टर की गहराई से बात करें तो थोक विक्रेताओं, स्टॉकिस्टों और बड़े डिस्ट्रीब्यूटर्स का तर्क है कि ईंधन की दरों में रोजाना होने वाली अस्थिरता के कारण वे अपनी पुरानी इन्वेंट्री और बाजार की कीमतों को बार-बार संशोधित नहीं कर सकते। एक बार जब किसी साबुन, बिस्किट या अनाज के पैकेट की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) बढ़ जाती है, तो तेल की कीमतों में मामूली 2-5 रुपये की गिरावट आने पर भी उसे वापस नीचे लाना आर्थिक रूप से लगभग नामुमकिन हो जाता है। जनता को इससे कोई फायदा नहीं होने वाला क्योंकि बाजार की मूल मानसिकता हमेशा संकट के समय भी अधिकतम लाभ कमाने की होती है, और टैक्स कटौती का अधिकांश मलाईदार हिस्सा आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के विभिन्न शक्तिशाली स्तरों पर ही अवशोषित कर लिया जाता है। अंतिम उपभोक्ता तक इसका वास्तविक लाभ हस्तांतरित करने के लिए देश में किसी भी प्रभावी और कठोर मूल्य निगरानी तंत्र का घोर अभाव है, जिसके कारण बड़ी कंपनियां और जमाखोर व्यापारी इस सरकारी राहत को चुपके से अपनी तिजोरी में डाल लेते हैं। इस प्रकार, एक तरफ सरकार की राजस्व हानि तो सुनिश्चित होती है, लेकिन उसका मूल आर्थिक उद्देश्य—यानी आम मध्यमवर्गीय आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को बढ़ाना—पूरी तरह से और शर्मनाक ढंग से विफल हो जाता है।
भारतीय सामाजिक और राजनैतिक विमर्श में अब यह मांग बहुत तेजी से जोर पकड़ रही है कि सरकार को पेट्रोल और डीजल जैसे बुनियादी आवश्यक वस्तुओं को एक राजनीतिक हथियार और चुनावी लॉलीपॉप के रूप में इस्तेमाल करना अब पूरी तरह बंद करना चाहिए। आम और शिक्षित नागरिक अब इस ‘टैक्स राहत’ और ‘दैनिक कटौती’ के जटिल चक्रव्यूह को बहुत अच्छी तरह समझने लगा है, जहाँ एक हाथ से कुछ रुपये कम करने का विज्ञापन किया जाता है और दूसरे हाथ से अप्रत्यक्ष महंगाई के रूप में जनता की जेब से दोगुना धन वसूल लिया जाता है। पेट्रोल-डीजल पर टैक्स की यह पूरी राजनीति अब धीरे-धीरे बेनकाब हो रही है क्योंकि जनता अब यह जान चुकी है कि वास्तविक और स्थायी राहत केवल तभी मिल सकती है जब कीमतों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप वैज्ञानिक तरीके से नीचे लाया जाए और उन्हें एक लंबी अवधि के लिए स्थिर रखा जाए, न कि समय-समय पर की जाने वाली इन दिखावटी और अस्थायी कटौतियों में अपना समय बर्बाद किया जाए। देश के सुदूर कोने-कोने से आने वाली आम जन की प्रतिक्रियाएं यही स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि लोग अब भव्य विकास के सरकारी दावों और अपनी वास्तविक दयनीय आर्थिक स्थिति के बीच के भयावह अंतर को साफ तौर पर देख रहे हैं। जब तक बुनियादी ढांचागत सुधार और महंगाई के दानव पर सीधा प्रहार नहीं होगा, तब तक करों में की गई कोई भी छोटी-बड़ी कटौती केवल एक खोखला चुनावी जुमला ही बनी रहेगी।

निष्कर्षतः, ईंधन की बेकाबू कीमतों में टैक्स के माध्यम से समय-समय पर की जाने वाली यह छेड़छाड़ करना एक ऐसी मामूली मरहम की तरह है जो कैंसर जैसे गहरे और जानलेवा जख्म को भरने में पूरी तरह से नाकाम और बेअसर है। जनता को इससे कोई फायदा नहीं होने वाला यह केवल एक विपक्षी नारा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी जमीनी सच्चाई और जनभावना बन गई है, जो हर उस उपभोक्ता के मुंह से अनायास निकलती है जिसे पेट्रोल पंप की लंबी कतार में आज भी अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा तेल के बदले स्वाहा करना पड़ रहा है। सरकार को यह गंभीरता से समझने की जरूरत है कि 21वीं सदी की भारतीय जनता अब बहुत जागरूक है और वह सत्ता के आंकड़ों वाले खेल से ज्यादा अपनी रसोई के गैस सिलेंडर, बच्चों की फीस और जेब की वास्तविक स्थिति को ही अंतिम सत्य मानती है। तेल की कीमतों में चंद पैसों की राहत का ढिंढोरा पीटने के बजाय अगर सरकार महंगाई के मूल और गहरे संरचनात्मक कारणों पर ध्यान दे, तो शायद आम आदमी की जिंदगी में कोई वास्तविक और सकारात्मक बदलाव देखने को मिले। फिलहाल की स्थिति में तो पेट्रोल और डीजल की यह कथित टैक्स कटौती केवल बड़े अखबारों की रंगीन सुर्खियों और टेलीविजन की डिबेट तक ही सीमित है, जबकि एक आम भारतीय की जिंदगी में महंगाई का भयावह दानव आज भी उतनी ही मजबूती और क्रूरता से अपने पैर पसारे हुए है।
आने वाले समय में यदि शासन और नीति निर्धारकों ने इस दिशा में कोई क्रांतिकारी, ईमानदार और पारदर्शी कदम नहीं उठाया, तो जनता के भीतर सुलगता हुआ यह असंतोष किसी भी समय एक बड़े और अनियंत्रित जन-आक्रोश का रूप ले सकता है। पेट्रोल और डीजल अब भारत में केवल एक सामान्य ईंधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक आम आदमी की आर्थिक गरिमा, उसके परिवार के भविष्य और उसके सामाजिक स्वाभिमान का एक अनिवार्य प्रतीक बन चुके हैं। जब तक एक साधारण और ईमानदार करदाता को यह महसूस नहीं होगा कि उसके जीवन स्तर में वास्तव में कोई ठोस सुधार हुआ है, तब तक कागजों पर की गई कोई भी टैक्स कटौती सफल या प्रशंसनीय नहीं मानी जाएगी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों का यह अनवरत और थका देने वाला चलता हुआ खेल अब अपने सबसे निर्णायक और संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जहाँ देश की जनता अब सरकारी कागजी राहत के बजाय अपनी मेज पर वास्तविक परिणाम और सस्ती वस्तुओं की मांग कर रही है। यह देखना वास्तव में बहुत दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण होगा कि वर्तमान सरकार इस बढ़ते हुए जन-अविश्वास को कैसे दूर करती है और क्या वास्तव में कभी भविष्य में ऐसी कोई ठोस राहत आएगी जो एक आम आदमी के मुरझाए हुए चेहरे पर वास्तविक मुस्कान ला सके। फिलहाल तो उम्मीद की किरण बहुत धुंधली नजर आती है और महंगाई का दर्दनाक सफर बदस्तूर जारी है।





