नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मौजूदा परिदृश्य में सब कुछ सामान्य नहीं दिखाई दे रहा और यही संकेत हाल के घटनाक्रम लगातार दे रहे हैं। जिस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल की ऐतिहासिक यात्रा पर रवाना हुए, उस वक्त यह अनुमान लगाया जा रहा था कि यह दौरा मुख्य रूप से अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों को संतुलित करने और रणनीतिक स्तर पर संवाद के नए रास्ते खोलने के लिए अहम साबित हो सकता है। लेकिन जैसे-जैसे घटनाएं आगे बढ़ीं, वैसे-वैसे तस्वीर कहीं अधिक जटिल और तीखी होती चली गई। प्रधानमंत्री के इज़राइल पहुंचने से पहले ही अमेरिका से दो ऐसी खबरें सामने आईं, जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव की रेखाओं को और गहरा कर दिया। पहली खबर भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले सोलर पैनल्स पर टैरिफ को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 126 प्रतिशत किए जाने की घोषणा से जुड़ी थी, जबकि दूसरी खबर कृषि क्षेत्र में भारत पर लगाए जा रहे कथित संरक्षणवादी रवैये को लेकर थी। इन दोनों मुद्दों ने यह साफ कर दिया कि अमेरिका भारत के साथ आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों में किसी तरह की नरमी दिखाने के मूड में नहीं है।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल की पहली स्टेट ऑफ द यूनियन स्पीच अमेरिकी संसद में दी, और इस भाषण ने कई छिपे संदेशों को सार्वजनिक मंच पर ला दिया। यह महज एक औपचारिक संबोधन नहीं था, बल्कि एक तरह से वैश्विक राजनीति की नई सीमारेखाओं का एलान भी था। दिलचस्प बात यह रही कि उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार इज़राइल की संसद को संबोधित करने जा रहे थे। दो लोकतांत्रिक देशों की संसदों में एक साथ दिए गए इन भाषणों ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक शक्ति संतुलन में इस वक्त भारत, अमेरिका और इज़राइल के रिश्ते निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। ट्रंप ने अपने भाषण में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला देते हुए यह साफ कहा कि अमेरिका की आर्थिक प्रगति, विकास और निवेश आकर्षित करने की नीति पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ने दिया जाएगा और टैरिफ के जरिए अधिक से अधिक पूंजी देश में लाई जाएगी। यह संदेश सीधे उन देशों के लिए था, जो यह मानकर चल रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिका की व्यापार नीति में नरमी आ सकती है।
इस बयान के कुछ ही समय पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया मंच पर भी एक तीखा संदेश साझा किया था, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि कोई भी देश यह भ्रम न पाले कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिका के साथ टैरिफ को लेकर ‘खेल’ किया जा सकता है। उस वक्त यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि उनका इशारा किस देश की ओर है, लेकिन अब तस्वीर काफी हद तक साफ हो चुकी है। ट्रंप के भाषण और उसके बाद आए फैसलों से यह संकेत मिलने लगा कि निशाने पर कहीं न कहीं भारत ही है। इसका कारण भी उन्होंने परोक्ष रूप से खुद ही गिना दिया। उन्होंने यह कहने से परहेज नहीं किया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध को उन्होंने ही रुकवाया था। यह दावा भारत की आधिकारिक स्थिति से बिल्कुल उलट था और इसी ने नई बहस को जन्म दे दिया। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उस समय किसी बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ी थी, लेकिन ट्रंप का बार-बार यह दोहराना इस बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिका इस मुद्दे को रणनीतिक दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस तरह के बयानों का असर केवल कूटनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक और आर्थिक परिणाम भी होते हैं। इस संदर्भ में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उन बयानों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिनमें वह लगातार यह कहते आ रहे हैं कि टैरिफ डील को वापस कर पाना अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बस से बाहर हो चुका है। ट्रंप की स्टेट ऑफ द यूनियन स्पीच के बाद यह सवाल और मजबूती से उभरकर सामने आया कि क्या वाकई अमेरिका ने भारत को लेकर अपनी नीति में सख्ती का मन बना लिया है। ट्रंप ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे उन देशों को अब पहले की तरह फायदा नहीं उठाने देंगे, जो अमेरिका के साथ व्यापार में भारी मुनाफा कमा रहे थे। उनके शब्दों में, अमेरिका का पैसा अब दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय घरेलू विकास में लगेगा। इस बयान को सीधे तौर पर भारत, इंडोनेशिया और लाओस जैसे देशों से जोड़कर देखा गया, जिन्हें अमेरिका ने सोलर पैनल व्यापार में चीन का अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने वाला माध्यम बताया।
सोलर पैनल्स को लेकर उठे इस विवाद ने भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों में एक नई दरार पैदा कर दी है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में भारत ने लगभग 7200 करोड़ रुपये के सोलर उत्पाद अमेरिका को निर्यात किए थे, जिन पर पहले केवल 10 प्रतिशत टैरिफ लगता था। लेकिन अब अमेरिका का आरोप है कि भारत चीन से सस्ते सोलर पैनल आयात करता है और फिर उन्हें अमेरिकी बाजार में बेचकर मुनाफा कमाता है। इसी आधार पर अमेरिका ने एंटी-डंपिंग ड्यूटी के तहत टैरिफ को सीधे 126 प्रतिशत तक बढ़ाने का फैसला किया। इससे पहले इसी तरह के आरोप वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड पर लगाए जा चुके थे, लेकिन इस बार भारत का नाम शामिल होना कई मायनों में अहम है। यह न केवल व्यापारिक बल्कि रणनीतिक संकेत भी देता है कि अमेरिका अब भारत को भी उसी श्रेणी में देखने लगा है, जहां वह चीन के प्रभाव को सीमित करना चाहता है।

इन घटनाओं के बीच वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य भी तेजी से बदल रहा है। ट्रंप ने अपने भाषण में चीन को सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए कहा कि उसने हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में परमाणु हथियार विकसित किए हैं और यह केवल व्यापार युद्ध तक सीमित खतरा नहीं है, बल्कि भविष्य में किसी भी तरह के सैन्य टकराव की संभावना को भी जन्म देता है। इसी क्रम में उन्होंने ईरान का जिक्र करते हुए यह साफ किया कि पिछले कई दशकों में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों ही सरकारें ईरान के मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाने में असफल रहीं, लेकिन अब वह इस स्थिति को टालने के पक्ष में नहीं हैं। उनके शब्दों में, ईरान को या तो अमेरिका के साथ डील करनी होगी या फिर युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल में मौजूद हैं और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू भी ईरान को कड़ी चेतावनी देने से पीछे नहीं हट रहे।
इन तमाम घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो साफ नजर आता है कि भारत, इज़राइल और अमेरिका के बीच एक जटिल त्रिकोण बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा को लेकर यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह दौरा आने वाले संभावित युद्ध से किसी तरह जुड़ा हुआ है। मध्य पूर्व में पहले से ही अस्थिर हालात हैं और ईरान, इज़राइल, रूस और चीन जैसे देशों की भूमिकाएं इस क्षेत्र को और संवेदनशील बना रही हैं। भारत का इज़राइल के साथ ऐसे समय पर खड़ा होना, जब अमेरिका खुद ईरान पर दबाव बढ़ा रहा है, अंतरराष्ट्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। यह भी चर्चा है कि प्रधानमंत्री मोदी के भारत लौटने के बाद, अगले 24 से 36 घंटों में क्षेत्रीय हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी होंगी।
इसी संदर्भ में यह भी समझना जरूरी है कि अमेरिका स्वयं सीधे युद्ध में उतरने से क्यों बच रहा है, जबकि इज़राइल पूरी तरह से तैयार दिखाई देता है। एक विश्लेषण यह भी कहता है कि अमेरिका एशियाई देशों में नए सहयोगियों के साथ नई डील करना चाहता है और इसी रणनीति के तहत वह पाकिस्तान जैसे देशों के साथ भी समीकरण साधने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, ब्रिक्स और एससीओ जैसे समूहों की बढ़ती भूमिका अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि इनमें रूस और चीन की साझेदारी को वह अपने लिए सीधी चुनौती मानता है। ट्रंप के भाषण में इन संकेतों का स्पष्ट उल्लेख देखने को मिला।
इन तमाम जटिल परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब इज़राइल की संसद में भाषण देंगे, तो उनका संदेश किस दिशा में जाएगा। क्या वह इज़राइल के मंच से अमेरिका के साथ रिश्तों को सुधारने का प्रयास करेंगे, या फिर भारत को एक स्वतंत्र और संतुलित शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हुए शांति दूत की भूमिका निभाने की कोशिश करेंगे। संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन शांति प्रस्ताव के दौरान भारत और अमेरिका दोनों की अनुपस्थिति ने पहले ही कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह भाषण केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए भी अहम माना जा रहा है।
अमेरिका की आंतरिक नीतियों पर नज़र डालें तो साफ दिखता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ऊर्जा और व्यापार नीति केवल विदेशों को संदेश देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका सीधा संबंध घरेलू राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में ट्रंप ने जिस आक्रामक अंदाज़ में यह कहा कि अमेरिका अब किसी भी कीमत पर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने का जरिया नहीं बनेगा, वह बयान उनके कोर वोट बैंक को ध्यान में रखकर दिया गया माना जा रहा है। अमेरिका में बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी की आशंकाएं और घरेलू उद्योगों पर बढ़ते दबाव ने ट्रंप प्रशासन को मजबूर किया है कि वह टैरिफ और प्रतिबंधों को हथियार की तरह इस्तेमाल करे। इसी कड़ी में भारत पर सोलर पैनल्स को लेकर लगाए गए भारी शुल्क को केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप यह संदेश देना चाहते हैं कि चाहे वह कोई मित्र देश ही क्यों न हो, अगर अमेरिका के आर्थिक हितों पर आंच आती है तो सख्ती तय है। यही कारण है कि भारत जैसे रणनीतिक साझेदार को भी इस बार छूट नहीं दी गई।

रूस से तेल आयात को लेकर भी भारत लगातार अमेरिका के निशाने पर बना हुआ है। यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है, जिसे अमेरिका बार-बार अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना का विषय बनाता रहा है। ट्रंप के हालिया बयान इस ओर इशारा करते हैं कि आने वाले समय में रूस से व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त दबाव बनाया जा सकता है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी जटिल हो जाती है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतें विशाल हैं और सस्ते रूसी तेल ने घरेलू अर्थव्यवस्था को काफी हद तक संतुलन में रखा है। ऐसे में अगर अमेरिका इस मुद्दे पर और आक्रामक रुख अपनाता है, तो भारत को या तो वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत तलाशने होंगे या फिर कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका को यह समझाना होगा कि भारत का फैसला पूरी तरह आर्थिक मजबूरी से जुड़ा है, न कि किसी भू-राजनीतिक समर्थन से।
इसी वैश्विक समीकरण में वेनेजुएला का नाम भी अचानक चर्चा में आ गया है। ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वह वेनेजुएला पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में ढील दे सकता है, ताकि अमेरिकी कंपनियों को वहां निवेश का मौका मिले और ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्प तैयार किए जा सकें। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भी रूस और चीन के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति का हिस्सा है। अगर अमेरिका वेनेजुएला से तेल आपूर्ति बढ़ाता है, तो वह भारत और अन्य एशियाई देशों पर अप्रत्यक्ष दबाव बना सकता है कि वे रूसी तेल पर निर्भरता कम करें। इस पूरे परिदृश्य में भारत खुद को दो ध्रुवों के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता हुआ पा रहा है, जहां एक ओर अमेरिका है और दूसरी ओर रूस व चीन जैसे पुराने साझेदार।
अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी ट्रंप के बयानों के बाद हलचल तेज हो गई है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने राष्ट्रपति के टैरिफ फैसलों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ेगी और अंततः इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। विपक्ष का तर्क है कि आयात शुल्क बढ़ने से अमेरिका में उत्पाद महंगे होंगे और महंगाई की मार आम नागरिकों को झेलनी पड़ेगी। हालांकि ट्रंप इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए यह दावा कर रहे हैं कि लंबी अवधि में यह नीति अमेरिका को आत्मनिर्भर बनाएगी। इसी राजनीतिक खींचतान के बीच भारत जैसे देशों को यह समझने में कठिनाई हो रही है कि अमेरिका की नीति कितनी स्थायी है और उसमें कितनी घरेलू राजनीति की छाया शामिल है।
भारत के अंदर भी इन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति अमेरिका के साथ संतुलन बनाने में विफल हो रही है। विपक्ष का कहना है कि सोलर पैनल्स पर भारी टैरिफ भारत के उभरते ग्रीन एनर्जी सेक्टर के लिए बड़ा झटका है और इससे लाखों नौकरियों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि भारत दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपने विकल्पों पर काम कर रहा है और किसी एक देश पर निर्भरता कम करने की रणनीति पहले से ही अपनाई जा रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत अब यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बाजारों में सोलर उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने पर जोर देगा।
इन तमाम परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा को लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इज़राइल और भारत के रिश्ते लंबे समय से रक्षा, तकनीक और कृषि जैसे क्षेत्रों में मजबूत रहे हैं। लेकिन मौजूदा दौर में इस यात्रा का राजनीतिक महत्व कहीं अधिक बढ़ गया है। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू पहले ही ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपना चुके हैं और अमेरिका का समर्थन उन्हें खुलकर मिलता रहा है। ऐसे में भारत का इज़राइल के साथ खड़ा होना उसे मध्य पूर्व की जटिल राजनीति में और गहराई से जोड़ सकता है। हालांकि भारत अब तक संतुलन की नीति पर चलता आया है और उसने ईरान के साथ भी संवाद के रास्ते खुले रखे हैं।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ महीने भारत की विदेश नीति के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं। एक ओर अमेरिका का बढ़ता दबाव है, दूसरी ओर रूस और चीन के साथ पुराने रणनीतिक संबंध हैं, और तीसरी ओर मध्य पूर्व की अस्थिरता है। इन सबके बीच भारत को अपनी आर्थिक विकास दर, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक स्वायत्तता को एक साथ साधना होगा। प्रधानमंत्री मोदी के इज़राइल से लौटने के बाद उनके बयानों और फैसलों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी, क्योंकि इन्हीं संकेतों से यह तय होगा कि भारत इस वैश्विक उथल-पुथल में किस दिशा में कदम बढ़ाने जा रहा है। कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां हर फैसला कई स्तरों पर असर डालता है। अमेरिका की सख्त व्यापार नीति, रूस-यूक्रेन युद्ध की छाया, चीन की बढ़ती ताकत और मध्य पूर्व का तनाव—इन सभी के बीच भारत को अपनी भूमिका बेहद सोच-समझकर निभानी होगी। आने वाला समय यह बताएगा कि क्या भारत इन चुनौतियों को अवसर में बदल पाएगा या फिर उसे इन वैश्विक दबावों की कीमत चुकानी पड़ेगी।





