पश्चिम एशिया। कल तक जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने तीखे तेवरों से ईरान की हज़ारों साल पुरानी सभ्यता को नक्शे से मिटाने की हुंकार भर रहे थे, आज वही ट्रंप कूटनीति की मेज पर समझौते के लिए मजबूर नजर आ रहे हैं। पश्चिम एशिया में मचे भीषण कोहराम और विनाशकारी हमलों के बीच एक सनसनीखेज मोड़ आया है, जहाँ अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच दो हफ्तों के लिए बंदूकों के शोर को खामोश कर दिया गया है। इस सीजफायर की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली शर्त यह है कि ईरान अब दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन यानी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खोलने पर राजी हो गया है, लेकिन यह नरमी मुफ्त में नहीं आई है। ईरान ने अपनी संप्रभुता और सुरक्षा को लेकर अमेरिका के सामने 10 ऐसी सख्त शर्तें रखी हैं, जिन्होंने व्हाइट हाउस के रणनीतिकारों के पसीने छुड़ा दिए हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस मध्यस्थता की पुष्टि करते हुए बताया कि शांति की पहली औपचारिक और निर्णायक बैठक 10 अप्रैल को इस्लामाबाद की सरजमीं पर होगी, जहाँ इन शर्तों पर अंतिम मुहर लगने की संभावना है।
ईरान की इन 10 शर्तों में सबसे प्रमुख मांग यह है कि अमेरिका को यह लिखित गारंटी देनी होगी कि भविष्य में कभी भी ईरानी धरती पर हमला नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही, ईरान ने साफ कर दिया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसकी बादशाहत और कंट्रोल बरकरार रहेगा और इसमें किसी भी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होगा। परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी ईरान ने अपने तेवर सख्त रखे हैं; उसकी शर्त है कि दुनिया को ईरान के यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) के अधिकार को स्वीकार करना होगा। आर्थिक मोर्चे पर ईरान ने अमेरिका को पूरी तरह घेर लिया है, जहाँ उसने देश पर लगे सभी प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंधों (Sanctions) को तत्काल प्रभाव से हटाने की मांग की है। सबसे दिलचस्प शर्त व्यापारिक है, जहाँ ईरान ने होर्मुज के रास्ते से गुजरने वाले हर विदेशी जहाज पर 2 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम फीस वसूलने का ऐलान किया है, जिसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में अपने खिलाफ लाए गए सभी निंदा प्रस्तावों को रद्दी की टोकरी में डालने की शर्त रखी है। ईरान यहीं नहीं रुका, उसने इस जंग में हुए अपने बुनियादी ढांचे और जान-माल के भारी नुकसान की भरपाई (Compensation) की मांग भी अमेरिका के सामने रख दी है। सुरक्षा के लिहाज से ईरान की नौवीं शर्त बेहद कड़ी है, जिसमें उसने क्षेत्र से अमेरिकी सशस्त्र बलों की पूरी तरह वापसी की वकालत की है। अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यह समझौता केवल कुछ दिनों के सीजफायर तक सीमित न रहे, बल्कि हमेशा के लिए युद्ध का अंत हो और लेबनान में इजराइल द्वारा किए जा रहे हमलों पर तुरंत पूर्ण विराम लगे। इन शर्तों ने यह साफ कर दिया है कि ईरान अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक कूटनीति के साथ अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में आ गया है।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने फिलहाल इस दो हफ्ते के संघर्षविराम को अपनी हरी झंडी दे दी है, लेकिन इसके पीछे छिपी चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर सख्त लहजे में कहा कि अगर अमेरिका या उसके सहयोगियों ने इस सीजफायर के दौरान कोई भी गुस्ताखी की या शर्तों का उल्लंघन किया, तो ईरान की सेना अमेरिका पर अब तक का सबसे भीषण और ज़ोरदार पलटवार करेगी। अराघची ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दो हफ्तों के लिए खोला जा रहा है, लेकिन वहां से गुजरने वाले हर एक जहाज की आवाजाही ईरानी सेना की कड़ी निगरानी और कोऑर्डिनेशन के तहत ही होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इसमें कुछ तकनीकी सीमाएं (Technical Limitations) भी लागू रहेंगी, जिसका मतलब है कि ईरान अभी भी इस समुद्री रास्ते की चाबी अपने पास ही रखना चाहता है। दुनिया की निगाहें अब 10 अप्रैल की उस बैठक पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि क्या यह शांति स्थाई होगी या फिर विनाश का नया दौर शुरू होगा।





